Thursday, May 24, 2012

life को compress कर थोडा ..

मैं छोटा सा नन्हा सा था


जब माँ की गोदी में था

घुटनों के बल चलता था

अपने घर के आँगन को मैं

खुशियों से भर देता था

फिर आया प्यारा सा बचपन

खेल खिलोने लाया बचपन

गाँव के खलिहानों में

खेतों में बाजारों में

तफरी खूब मचाता बचपन

बचपन से यौवन फिर आया

अपने संग रवानी लाया

खेल खिलोने सब बदल गए

मौजों के वो सावन लाया

पतझड़ में वो गरम पियाली

बारिश में गरम समोसे लाया

टिप टिप गिरती बूंदों के संग

प्रेम ने मुझको नाच नचाया

यौवन का ये रास रंग

प्रतिदिन होली और दिवाली लाया

समय बीत गया कब कैसे

कोई न चेतावनी लाया



जीवन होता थोडा ही

बस बचपन और जवानी लता

नहीं बुढ़ापा नहीं बीमारी

तेरे दर मैं हँसता आता

करूँ प्रार्थना तुझसे से हे हरि

life को compress कर थोडा

दे खुशियों से भर इसको दाता !

3 comments:

  1. reminds me of the poem from shakesphere..... The seven ages.....
    looks like this is a hindi version of the same.... the meaning behind both is the same..... the life cycle u can say in general... i cannot compare u with him.... but yeah this not less when the objective is taken care of..... :) :)
    Good n classic work .... :) :)

    ReplyDelete

Thank you for taking time out to comment on this creation. Happy Reading . Please revisit.