मजबूर सा हूँ मैं
वक़्त के हाथ कुछ
इतिहास यूँ
ही लौट आता है
मेरे
जब पास कुछ
सोच
लेता हूँ सदा
कर पायेगा
न ये इस बार कुछ
फिर
वही होता है
जो
होता रहा है
सालों से कुछ
मैं
खड़ा रह जाता हूँ
दंग
यूँ मजबूर कुछ
चाह के भी
छोड़ पता नहीं
मैं
दामन दर्द का
हर बार सा
इस बार भी
लिख गया ऐसा
इतिहास कुछ
बाँध बैठा हूँ मैं
दिल को
कच्चे धागों से तेरे
इस कदर तेरी जुदाई
ले गयी
मेरे दीवानेपन का
इम्तेहान कुछ
एक अजब सा ही नशा है
इन्तेजार का तेरे
इस बार जो
तुम गए
बढ़ गया मेरे
दर्द का एहसास कुछ
Monday, April 26, 2010
Tuesday, February 9, 2010
बसंत
रे बसंत ! ये हवा कहाँ से ले आया
मंद मंद मनमोहक सी ये
गंध कहाँ से ले आया ,
पतझड़ से व्याकुल वृक्षों पर
अब नवजीवन की कोपल है ,
रे बसंत ! इस मृत जीवन के
प्राण कहाँ से ले आया !!
प्रकृति प्रसन्न मन आनंदित
हर्षित पुलकित नर नारायण ,
कोयल की कूहू कूहू से
अब चहक रहा है चंचल मन ,
रे बसंत ! मनभावन ये
संगीत कहाँ से ले आया !!
कांतिहीन इस चेहरे की
मुस्कान कहाँ से ले आया ,
ॐ आनंदमय ॐ शांतिमय
चरितार्थ हो रहा हर क्षण है ,
रे बसंत ! इस व्यथित ह्रदय का
चैन कहाँ से ले आया ,
रे बसंत ! इस नवजीवन का
सन्देश कहाँ से ले आया !!
मंद मंद मनमोहक सी ये
गंध कहाँ से ले आया ,
पतझड़ से व्याकुल वृक्षों पर
अब नवजीवन की कोपल है ,
रे बसंत ! इस मृत जीवन के
प्राण कहाँ से ले आया !!
प्रकृति प्रसन्न मन आनंदित
हर्षित पुलकित नर नारायण ,
कोयल की कूहू कूहू से
अब चहक रहा है चंचल मन ,
रे बसंत ! मनभावन ये
संगीत कहाँ से ले आया !!
कांतिहीन इस चेहरे की
मुस्कान कहाँ से ले आया ,
ॐ आनंदमय ॐ शांतिमय
चरितार्थ हो रहा हर क्षण है ,
रे बसंत ! इस व्यथित ह्रदय का
चैन कहाँ से ले आया ,
रे बसंत ! इस नवजीवन का
सन्देश कहाँ से ले आया !!
Monday, January 11, 2010
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था
न साथी न मंजिल न कुछ भी नजर आ रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था!!
आजू भी देखा बाजु भी देखा
कहीं भी न कुछ नजर आ रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
कुछ दूर पथ पर अकेला मैं आगे बढ़ा था
वही आगे एक भिखारी खड़ा था
भिखारी से भी पथ को पूछा था मैंने
भिखारी के आगे भिखारी खड़ा था
इस बात पर वो हँसा जा रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
नाच रहा था अकेला भाग की मैं उँगलियों पर
रोया रोया और रोया
भाग्य पर मैं फूट रोया
हाल पर ( मेरे ) चश्मा लगाये
मेरा पडोसी हँसा जा रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
उसकी शादी आज थी और मैं हलवाई बना था
हवा पूरी और खोया
खीर में नीम्बू पड़ा था
हाल पर ( मेरे ) सेहरा सजाये
उसका दूल्हा हँसा जा रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
साथ मेरे कोई नहीं मैं अकेला जा रहा था
मौत भी आयेगी न मुझको
ख्याल मुझको डरा रहा था
कूद जाऊं फांद जाऊं
डूब जाऊं जा कर कहीं मैं
हाल पर ( मेरे ) पूंछ उठाये
यम का भैंसा हँसा जा रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
Vivek / Rishi
न साथी न मंजिल न कुछ भी नजर आ रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था!!
आजू भी देखा बाजु भी देखा
कहीं भी न कुछ नजर आ रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
कुछ दूर पथ पर अकेला मैं आगे बढ़ा था
वही आगे एक भिखारी खड़ा था
भिखारी से भी पथ को पूछा था मैंने
भिखारी के आगे भिखारी खड़ा था
इस बात पर वो हँसा जा रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
नाच रहा था अकेला भाग की मैं उँगलियों पर
रोया रोया और रोया
भाग्य पर मैं फूट रोया
हाल पर ( मेरे ) चश्मा लगाये
मेरा पडोसी हँसा जा रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
उसकी शादी आज थी और मैं हलवाई बना था
हवा पूरी और खोया
खीर में नीम्बू पड़ा था
हाल पर ( मेरे ) सेहरा सजाये
उसका दूल्हा हँसा जा रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
साथ मेरे कोई नहीं मैं अकेला जा रहा था
मौत भी आयेगी न मुझको
ख्याल मुझको डरा रहा था
कूद जाऊं फांद जाऊं
डूब जाऊं जा कर कहीं मैं
हाल पर ( मेरे ) पूंछ उठाये
यम का भैंसा हँसा जा रहा था
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
एक अनजान पथ पर चला जा रहा था !!
Vivek / Rishi
जब मैं अकेला चलता हूँ
जब मैं अकेला चलता हूँ
तो लोग मेरी मुस्कराहट का राज़ पूछते हैं
तुम्हारे ख्यालों में डूबे मेरे दिल में
बजती धुनों का साज़ पूछते हैं
बेताबियों को पढ़ कर मेरी अक्सर
मुझसे मेरे जज़्बात पूछते हैं
झोका हवा का हूँ मैं , मुझसे
कैसे उठा ये तूफ़ान पूछते हैं !!!
Vivek / Rishi
तो लोग मेरी मुस्कराहट का राज़ पूछते हैं
तुम्हारे ख्यालों में डूबे मेरे दिल में
बजती धुनों का साज़ पूछते हैं
बेताबियों को पढ़ कर मेरी अक्सर
मुझसे मेरे जज़्बात पूछते हैं
झोका हवा का हूँ मैं , मुझसे
कैसे उठा ये तूफ़ान पूछते हैं !!!
Vivek / Rishi
शादी से पहले और शादी के बाद
शादी से पहले
खुली मेरी खिड़की है बंद तेरा दरवाजा
नजरें मिलाऊं कैसे मुझे बतलाइए
पागल तेरा कुत्ता है पागल तेरा भाई है
पास तेरे आऊं कैसे मुझे बतलाइए
घर से बहार जब माँ बाप भाई जाएँ
खिड़की पे आके ज़रा दरस दिखाइए
प्यार को तेरे मैं तरस रहा हूँ गोरी
कुछ भी करिए पर तड़प मिटाइए !!
अब शादी के बाद
खुली मेरी खिड़की है खुला मेरा दरवाजा
कब आप जाएँगी मुझे बतलाइए
पागल तेरा कुत्ता था पागल तेरा भाई था
मैं भी पागल हो गया हूँ
कुछ तो रहम खाइए
घर से बहार जब चुन्नी मुन्नी मुन्ना जाएँ
खिड़की से कूद के आप भाग जाइये
प्यार को तेरे मैं भुगत रहा हूँ गोरी
मुझे मार दीजिये या छत से कूद जाइये !!!
खुली मेरी खिड़की है बंद तेरा दरवाजा
नजरें मिलाऊं कैसे मुझे बतलाइए
पागल तेरा कुत्ता है पागल तेरा भाई है
पास तेरे आऊं कैसे मुझे बतलाइए
घर से बहार जब माँ बाप भाई जाएँ
खिड़की पे आके ज़रा दरस दिखाइए
प्यार को तेरे मैं तरस रहा हूँ गोरी
कुछ भी करिए पर तड़प मिटाइए !!
अब शादी के बाद
खुली मेरी खिड़की है खुला मेरा दरवाजा
कब आप जाएँगी मुझे बतलाइए
पागल तेरा कुत्ता था पागल तेरा भाई था
मैं भी पागल हो गया हूँ
कुछ तो रहम खाइए
घर से बहार जब चुन्नी मुन्नी मुन्ना जाएँ
खिड़की से कूद के आप भाग जाइये
प्यार को तेरे मैं भुगत रहा हूँ गोरी
मुझे मार दीजिये या छत से कूद जाइये !!!
Friday, November 27, 2009
इक बार उस से मिल लूँ मैं
बंजारा हूँ भटकने पे भरोसा है मेरा
जहाँ शाम बस वही बसेरा है मेरा |
मंजिल है न राही, ना कोई साथ में चलता
जो राह में मिलाता है , वहीँ दोस्त है मेरा |
साहिल समझ रहा है की में मंजिल को पा गया
किनारा नहीं , मंजिल मजधार है मेरा |
रुक जाये अगर नदिया कहीं तो उस पर चला जाऊं मैं
इस धार के उस पर कही प्यार है मेरा |
यह कविता मेरे मित्र विवेक और मेरा संयुक्त प्रयास है| इस रचना के साथ मैं इस ब्लॉग पर विवेक को आमंत्रित कर रहा हूँ और आशा करता हूँ की हम साथ बहुत सी नयी कृतियाँ प्रस्तुत करेंगे |
जहाँ शाम बस वही बसेरा है मेरा |
मंजिल है न राही, ना कोई साथ में चलता
जो राह में मिलाता है , वहीँ दोस्त है मेरा |
साहिल समझ रहा है की में मंजिल को पा गया
किनारा नहीं , मंजिल मजधार है मेरा |
रुक जाये अगर नदिया कहीं तो उस पर चला जाऊं मैं
इस धार के उस पर कही प्यार है मेरा |
यह कविता मेरे मित्र विवेक और मेरा संयुक्त प्रयास है| इस रचना के साथ मैं इस ब्लॉग पर विवेक को आमंत्रित कर रहा हूँ और आशा करता हूँ की हम साथ बहुत सी नयी कृतियाँ प्रस्तुत करेंगे |
Thursday, October 29, 2009
बलिदान
आज क्लांत मन से डर कर
मधुशाला में जाना होगा
मधुबाला के आँचल में छिप
मधु रंग में मिल जाना होगा
जीवन संघर्ष विमुख हो
कुछ क्षण मुझको सो जाना होगा
रे भाग्य ! तेरी निष्ठुरता
किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया मुझे
जीवन के इस महा समर में
अस्त्रहीन कर दिया मुझे
मैं असहाय जीव तू निर्मम
हत्यारा बन बैठा है
मनु पुत्र के माथे पर
तेरा काल सर्प फन फैला है
पर जान मुझे न कायर तू
मैं पुरुषों का स्वामी हूँ
मैं जान चूका तेरा स्वाभाव
मैं जान गया क्या करना है
अब बिन प्रद्दुम्न नाद के
मुझको प्रत्युत्तर देना है
है सही कहा श्री गीता में
माधव ने जब चक्र धरा
भीम पुत्र के गर्जन से
जब भूमंडल ठहर गया
सीख मुझे मिल गयी समझ ले
कुछ बलिदान तो देना होगा
जीवन के इस धर्म युद्ध में
कुछ बलिदान तो करना होगा .....
मधुशाला में जाना होगा
मधुबाला के आँचल में छिप
मधु रंग में मिल जाना होगा
जीवन संघर्ष विमुख हो
कुछ क्षण मुझको सो जाना होगा
रे भाग्य ! तेरी निष्ठुरता
किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया मुझे
जीवन के इस महा समर में
अस्त्रहीन कर दिया मुझे
मैं असहाय जीव तू निर्मम
हत्यारा बन बैठा है
मनु पुत्र के माथे पर
तेरा काल सर्प फन फैला है
पर जान मुझे न कायर तू
मैं पुरुषों का स्वामी हूँ
मैं जान चूका तेरा स्वाभाव
मैं जान गया क्या करना है
अब बिन प्रद्दुम्न नाद के
मुझको प्रत्युत्तर देना है
है सही कहा श्री गीता में
माधव ने जब चक्र धरा
भीम पुत्र के गर्जन से
जब भूमंडल ठहर गया
सीख मुझे मिल गयी समझ ले
कुछ बलिदान तो देना होगा
जीवन के इस धर्म युद्ध में
कुछ बलिदान तो करना होगा .....
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