Monday, January 21, 2013

यादों की लाशें ..

अधमरी सी सुबह में

तुम्हे बर्फ में लाशें खोजते देखा

कल रात क्या हुआ

कुछ बताओगी

तुम्हारी ऑंखें खुली हुई थीं

पर होश में नहीं लग रही थी तुम

सहमी हुई तो नहीं

पर बिखरी हुई लग रही थी

क्या हुआ अगर वो नहीं रहा

और आएंगे

तुम्हरे ज़हन में बरसों से जमी बर्फ से

उसकी यादों की लाशें मत उखाड़ो ..

Monday, January 14, 2013

सच से होते हैं अनजान ये चेहरे ..


भीड़ में हसते चेहरे

खोये खोये बदहवास चेहरे

झूठ बोलते चेहरे

प्यार के वादे करते चेहरे

मुझे अकेला देख अपने अकेलेपन से डरते चेहरे

उसी डर को छुपाने को किसी और का हाथ पकड़ मुस्कुराते चेहरे

छोटे लकड़ी के ठेलों के पीछे खड़े उदास चहरे

उन्ही ठेलों पर बेफालतू बातें बनाते चेहरे

अपनी रोजी रोटी कमाने में मशगूल चेहरे

तरह तरह के चेहरे दिखते हैं बाजार में

सब में बस एक समानता होती है

सच से होते हैं अनजान ये चेहरे

Tuesday, January 8, 2013

रूद्रके तांडव की राह देख रहा हूँ ..

संवेदनशीलता का उड़ता उपहास देख रहाहूँ

महाभारत से अबतक सिर्फ येबदलाव देख रहा हूँ

द्रौपदी चीर हरण पर महात्माओं ने तब नजरें झुकली थीं

अब तो सब पर दुह्स्सासन का प्रभाव देख रहा हूँ

मनु पुत्र अब कहाँगए , कहाँ गए सब धर्मराज

दानवों के अट्ठाहसमें , उनके बढ़ते दुस्साहस से

धर्म का प्रतिपलनाश देख रहा हूँ

मानवता पर भीषणअत्याचार देख रहा हूँ

देख रहा हूँ अर्थियों पर होती राजनीति

क्षेत्रवाद से हताहत एक राष्ट्र देख रहा हूँ

कलि के युगका अंत करोअब हे प्रभु

प्रलय वाहक रूद्रके तांडव की राह देख रहा हूँ

Sunday, January 6, 2013

और क्या लिखूं ..

क्या लिख रहे हो

पान वाले भैया ने पूछा मुझसे

"सोच रहा हूँ क्या लिखूं ,

ख्वाबों पर लिख चुका  हूँ

 सच झूठ सब लिख चुका हूँ

किसी के साथ और अकेलेपन पर

बंद खिडकियों और बंद दरवाजों

सब पर लिख चुका हूँ

लिख चुका हूँ आँखों पर

उन होठों पर लिख चुका हूँ

खुली बाँहों और बंद दिलों पर लिख चुका हूँ

छोटी गुड़िया पर लिख चुका हूँ और

सफ़ेद बालों वाली बुढ़िया पर लिख चुका हूँ

भ्रष्ट नेताओं पर और कामचोर बाबुओं पर लिख चुका हूँ

लिख चुका हूँ   अपने दिल का हाल

अपने देश के हालात  भी लिख चुका हूँ

अब तुम ही  बताओ भैया

और क्या लिखूं "





Wednesday, June 27, 2012

तसल्ली मत दे मुझको मेरे मालिक ..

ज़िन्दगी की तंग बेरंग गलियों में रहा बैठा बरसो


अब उस की गलियों में बदतमीजियों का मजा आ रहा है

सलीके से जीने में क्या रखा है यारों

अब बेपरवाह आवारगी में बड़ा मजा आ रहा है

डाल से टूट नदिया में गिरा तो गम नहीं

नदिया के धारे में रपटने में मजा आ रहा है

तसल्ली मत दे मुझको मेरे मालिक

अब इन बढती बेचैनियों में मजा आ रहा है !!

Wednesday, June 20, 2012

शौक

आबेज़ार से किस्मत लिखी मेरी


की आबिद को शौक हज़ार दिए

बदबख्ती ये की न दिया तो इक एक वक़्त

न मौज में डूबे हुए हमराह ही दिए



Tuesday, June 19, 2012

माँ भारती का क्रोध

मेरी चीत्कार से भी न खुली


जो आखें उनको बंद कर दो

मेरी रक्षा में उठे न जो

वो हाथ अपने छिन्न कर दो

कभी मेरे  ही आँगन में जो खेली

वो जवानी नष्ट कर दो

भ्रष्ट है सारी ही दुनिया

अब प्रलय का संधान कर दो

राम के तरकश में देखो

तीर अब भी अनगिनत हैं

कर दो चढ़ाई निडर हो

कलियुगी मानव पे अब तो