जाने कब से ज़िन्दगी को कोस रहा हूँ
मौत की तारीफें कर रहा हूँ
ऊपर वाले की इस देन को
तोहफा समझूं या सजा
यही नहीं समझ आता
जब भी कहीं दुःख और परेशानी दिखती है
मन भर आता है
एक पल को भी सहा नहीं जाता
सोचता हूँ क्या जीना इतना जरुरी है
ये ज़िन्दगी अपना गुलाम बना कर राखी है सबको
कितनी बुराइयाँ कर चुका हूँ उसकी
पर मरने की दुआ मांगने की हिम्मत भी तो नहीं होती
जिंदा रहना मरने से कहीं अच्छा है शायद !
मौत की तारीफें कर रहा हूँ
ऊपर वाले की इस देन को
तोहफा समझूं या सजा
यही नहीं समझ आता
जब भी कहीं दुःख और परेशानी दिखती है
मन भर आता है
एक पल को भी सहा नहीं जाता
सोचता हूँ क्या जीना इतना जरुरी है
ये ज़िन्दगी अपना गुलाम बना कर राखी है सबको
कितनी बुराइयाँ कर चुका हूँ उसकी
पर मरने की दुआ मांगने की हिम्मत भी तो नहीं होती
जिंदा रहना मरने से कहीं अच्छा है शायद !