Wednesday, June 6, 2012

जिंदा रहना मरने से कहीं अच्छा है शायद

जाने कब से ज़िन्दगी को कोस रहा हूँ


मौत की तारीफें कर रहा हूँ

ऊपर वाले की इस देन को

तोहफा समझूं या सजा

यही नहीं समझ आता

जब भी कहीं दुःख और परेशानी दिखती है

मन भर आता है

एक पल को भी सहा नहीं जाता

सोचता हूँ क्या जीना इतना जरुरी है

ये ज़िन्दगी अपना गुलाम बना कर राखी है सबको

कितनी बुराइयाँ कर चुका हूँ उसकी

पर मरने की दुआ मांगने की हिम्मत भी तो नहीं होती

जिंदा रहना मरने से कहीं अच्छा है शायद !

Thursday, May 24, 2012

life को compress कर थोडा ..

मैं छोटा सा नन्हा सा था


जब माँ की गोदी में था

घुटनों के बल चलता था

अपने घर के आँगन को मैं

खुशियों से भर देता था

फिर आया प्यारा सा बचपन

खेल खिलोने लाया बचपन

गाँव के खलिहानों में

खेतों में बाजारों में

तफरी खूब मचाता बचपन

बचपन से यौवन फिर आया

अपने संग रवानी लाया

खेल खिलोने सब बदल गए

मौजों के वो सावन लाया

पतझड़ में वो गरम पियाली

बारिश में गरम समोसे लाया

टिप टिप गिरती बूंदों के संग

प्रेम ने मुझको नाच नचाया

यौवन का ये रास रंग

प्रतिदिन होली और दिवाली लाया

समय बीत गया कब कैसे

कोई न चेतावनी लाया



जीवन होता थोडा ही

बस बचपन और जवानी लता

नहीं बुढ़ापा नहीं बीमारी

तेरे दर मैं हँसता आता

करूँ प्रार्थना तुझसे से हे हरि

life को compress कर थोडा

दे खुशियों से भर इसको दाता !

Tuesday, May 22, 2012

प्रेम

तुम सकुचाये पल भर को

नयना दृग भर आये यूँ

दूर तलक फैले नभ में

मेघ तभी घिर आये ज्यूँ

मतवारे मन के आँगन में

हस के फूल खिलने वालों

गरज बरसती बारिश में यूँ

नृत्य सुधा बरसाने वालों

गिरिधर के न आने से ये रास नहीं रुका करता है

कुछ पल दूर बिताने से ये प्रेम नहीं मरा करता है !!

Monday, May 21, 2012

समंदर की लहरों पर तैरती राख सा

इन्तेजार की हद बीती


हर गुजरते साये के संग

टकटकी लगी नज़रों पे अब

कुछ तो रहम कर

शर्मिंदा मैं क्यूँ होऊं सोचता हूँ

मैं पहुच गया तू ही नहीं आई

समंदर की लहरों पर तैरती राख सा हूँ

बरबस उछलता और गिरता

किनारे पर तुझसे मिलन की आस में

राख बन रेत पर फैला हुआ हूँ

राह देखता हूँ तेरी

कभी किसी शाम मुझ पर भी नंगे पैर चल ..

Friday, April 20, 2012

बेटी की विदाई ..

माँ की तीसरी बेटी की विदाई है


दामाद जी सामने बैठे हैं

"बेटा ये भी ले लो ,

वो तुम्हारी माँ की साड़ी रख दी है ,

आलता और चूड़ी भी ,

समधी जी की पैंट शर्ट भी रखी है ,

मेरी बेटी ने खाया नहीं है कल से कुछ ,

रास्ता लम्बा है आपके घर तक ,

रस्ते में पूछ लीजियेगा

वो खुद नहीं मांगेगी , बड़े नाजों से पाला है "

माँ की आवाज काप रही है

आंसू दिख नहीं रहे हैं

अपने आंसूं खुद हे पिए जा रही है माँ

ख़ुशी का मौका जो है

"बेटा आपकी माँ की तबियत अब कैसी है ,

अरे सुनिए जी ! दामाद जी के परिवार को चौथ का न्योता भी दिए दे रही हूँ

रुमाल पर हल्दी लगा है, ले लीजिये "

दामाद जी के दोस्तों को भी उतना ही प्यार दे रही है माँ ,

"अरे बाबु को दो न, पानी कहाँ है, चाय लाओ

थोडा सा चाय पी लीजिये प्लीज़ "

माँ हसना चाह रही है , कन्यादान का सुख जो है

गर्व भी है

तीन तीन बेटियों का कन्यादान , किसी तीर्थ की अब जरूरत जो नहीं ,

प्यार से पाली बेटी किसी और की हो चुकी है

अब नहीं रुका जा रहा है माँ से ,

आंसू बहने लगे हैं

बेटी को गले लगा कर बोली ,

"बेटी तुम्हे तो कुछ बताने की जरुरत नहीं , अपनी नयी माँ का ख्याल रखना !! "

माँ बाहर तक भी नहीं आई नयी कार में बैठाने बेटी को

आंसुओ का बोझ बेटी का रास्ता भरी न कर दे !!

Thursday, November 17, 2011

हर रात अकेला बैठा.. One of those many absurd thoughts..

हर रात अकेला बैठा किताब के पन्ने पलटता हूँ ,

आज भी कोई अलग नहीं

कोई आहट भी तो नहीं होती आँगन में ,

दरवाजे पर कोई कान लगाये सुन तो नहीं रहा है ,

झटपट पलट देखता हूँ ,

कहीं तुम तो नहीं ,

तम्हारी मुझे डरा देने की आदत कभी जाएगी नहीं,

पर अच्छा है ,

हाथ में कलम लिए पन्नों को घूर रहा हूँ कब से ,

अल्फाज़ मिल नहीं रहे हैं जैसे,

दो ही तो थीं जो मुझे जिन्दा रखे थीं ..

तुम और मेरी कवितायेँ..

दोनों एक साथ चली गयीं कहीं ..

आ जाओ बस आखिरी बार सही ,

एक छोटा सा चीटा बार बार दौड़ मेरी और आ रहा है ,

कहीं तुमने तो नहीं भेजा उसे ,

क्या बकवास !

पागल हो गया हूँ लगता है ,

आज तो गली में कुत्ते भी नहीं भोंक रहे हैं ,

उन्हें भी पता है

कोई फायदा नहीं,

ऐसे भी जग ही रहा हूँ मैं ,

क्या करूँ ; तुम्हारी याद सोने ही नहीं देती !!

Sunday, September 25, 2011

शिकायत

गहराइयों में डूबे अक्सर समंदर को कोसा करते हैं,
तलहटी में गन्दगी सही , चलो मान लिया तुम्हारा दिल साफ़ है !!

खोयी आवाज़ मेरी शोर के बीचोबीच कहीं,
तुमने पलट का खोजने की कोशिश भी तो नहीं की !!

जिस्म पर लिबास बदलने में बहुत वक़्त लिया तुमने,
कभी मेरे जख्मो पर मलहम लगाने की कोशिश भी तो नहीं की !!

खिड़की के बहार देखता रहा मैं अक्सर तुम्हारी राह,
तुमने एक ख़त लिख कर अपने ना आने की खबर तक तो न दी !!