सूखे पेड़ों की डालों पर लगे सूखे पत्तों में
हवा के थपेड़ों से कटे पथ्थरों के जख्मों में
बरसों बारिश की एक बूँद को तरसी धरती की दरारों में
और
किसी मासूम के चेहरे की उडी रंगत में
जाने क्या ढूंढता हूँ...
अख़बारों के पन्नों को घूरती निगाहों में जाने क्या ढूंढता हूँ
मंदिर के आगे लगी लाइन में थके चेहरों में
राह में भटके राही की हांफती सांसों में
और
चिलचिलाती धूप में थके किसान की असमान की ओर टकटकी लगायी आखों में
जाने क्या ढूंढता हूँ ...
दो पत्थरों के बीच सकुचाई नदी के रुके बहाव में जाने क्या ढूंढता हूँ
लड़ाई के मैदान में अपने बच्चे की चिट्ठी पढ़ते जवान की लड़खड़ाई जबान में
ठण्ड से थरथराती वृद्धा की आह में
और
अपने प्रेमी से बिछड़ी प्रेमिका की फैली बाँहों में
जाने क्या ढूंढता हूँ ..
............................................ आस , इक उम्मीद शायद .............................................................